संस्कृत श्लोक हिंदी अर्थ सहित | Sanskrit slokas for competition with meaning in Hindi

Best sanskrit slokas for competition for children with meaning in Hindi

 


Following are the best sloka or stotras in Sanskrit with meaning in Hindi are sanskrit shloka recitation competition

Best sanskrit slokas for competition

यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निर्घषणच्छेदन तापताडनैः। तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा।।

भावार्थ :-

घिसने,काटने,तापने और पीटने, इन चार प्रकारों से जैसे सोने का परीक्षण होता है,इसी प्रकार त्याग, शील, गुण,एवं कर्मों से पुरुष की परीक्षा होती है ।
 
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सत्य– सत्यमेवेश्वरो लोके सत्ये धर्मः सदाश्रितः । सत्यमूलनि सर्वाणि सत्यान्नास्ति परं पदम् ॥


भावार्थ :-

सत्य ही संसार में ईश्वर है; धर्म भी सत्य के ही आश्रित है; सत्य ही समस्त भव – विभव का मूल है; सत्य से बढ़कर और कुछ नहीं है ।

✌ पन्चाग्न्यो मनुष्येण परिचर्या: प्रयत्नत: । पिता माताग्निरात्मा च गुरुश्च भरतर्षभ।।

भावार्थ :-

भरतश्रेष्ठ ! पिता, माता, अग्नि, आत्मा और गुरु – मनुष्य को इन पांच अग्नियों की बड़े यत्न से सेवा करनी चाहिए।

 दर्शने स्पर्शणे वापि श्रवणे भाषणेऽपि वा। यत्र द्रवत्यन्तरङ्गं स स्नेह इति कथ्यते॥

भावार्थ :-

यदि किसी को देखने से या स्पर्श करने से, सुनने से या बात करने से हृदय द्रवित हो तो इसे स्नेह कहा जाता है॥

 वाणी रसवती यस्य,यस्य श्रमवती क्रिया ।
लक्ष्मी : दानवती यस्य,सफलं तस्य जीवितं ।।

भावार्थ :-

जिस मनुष्य की वाणी मीठी है, जिसका कार्य परिश्रम से परिपूर्ण है, जिसका धन दान करने में प्रयोग होता है, उसका जीवन सफल है।
 

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः |

नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति ||

भावार्थ :-

मनुष्य का सबसे बड़ा दुश्मन उसका आलस्य है | परिश्रम जैसा हमारा

दूसरा कोई अन्य मित्र नहीं होता, क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी

नहीं होता |

 

चोरहार्य राजहार्य भ्रतृभाज्यं भारकारि।

व्यये कृते वर्धति एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्।।

भावार्थ :-

एक ऐसा धन जिसे चोर चुराकर ले जा सकता है, ही राजा छीन सकता

है, जिसका भाइयों में बंटवार हो सकता है, जिसे संभालना मुश्किल

भारी होता है और जो अधिक खर्च करने पर बढ़ता है, वो विद्या है। यह

सभी धनों में से सर्वश्रेष्ठ धन है।

पुस्तकस्था तु या विद्या,परहस्तगतं धनम्

कार्यकाले समुत्तपन्ने सा विद्या तद् धनम् ।।

भावार्थ :-

पुस्तक में रखी विद्या तथा दूसरे के हाथ में गया धन, ये दोनों ही ज़रूरत

के समय हमारे किसी भी काम नहीं आया करते|

विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्

पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम्

भावार्थ :-

ज्ञान विनम्रता प्रदान करता है, विनम्रता से योग्यता आती है और योग्यता

से धन प्राप्त होता है जिससे व्यक्ति धर्म के कार्य करता हैं और सुखी रहता

है|
 

Sanskrit shloka recitation competition

Sanskrit recitation competition for Nursery,UKG,IKG

 

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